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Jamun, जामुन

Jamun, जामुन (Syzygium cumini)
jamun

 

जामुन के विभिन्न भाषाओँ में नाम :-

संस्कृत - राज जम्बू
हिंदी- बड़ी जामुन, छोटी जामुन
मराठी - जांभूळ
गुजराती - जाम्बु
बंगाली - बड़जाम, कालजाम
तेलुगु - नेरेडू, पद्दनरेडि
तमिल - शबल नांवाल, शम्बू
मलयालम - नवल
कन्नड़ - दोहुनीरतु , नेरले
फ़ारसी - जामन
इंग्लिश - जाम्बुल ट्री
latin - eugenia jambolana .

जामुन के गुण ( characteristics and qualities of jamun ) - बड़ी जामुन स्वादिष्ट, भारी, रुचिकारी और विष्टम्भी होती है तथा छोटी जामुन ग्राही, रूखी, तथा पित्त , कफ , रुधिर विकार तथा दाह (जलन ) का शमन करने वाली होती है. इसकी गुठली का चूर्ण मल बाँधने वाला तथा मधुमेह नाशक होता है. इसमें प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन A , बी और सी के अलावा खनिज द्रव्य तथा अन्य पौष्टिक तत्व होते हैं. यह विपाक में कटु और शीतवीर्य होती है.

जामुन के रासायनिक संघटक ( chemical ingredients of jamun ) - जामुन के फल में आर्द्रता ८३.७ % , प्रोटीन ०.७ % , वसा ०.३ % , कार्बोहाइड्रेट १४ % , खनिज द्रव्य, विटामिन A , B , C , मेलीक एसिड , ऑक्जेलिक एसिड, गैलिक एसिड, टेनिन, एक सुगन्धित तेल और नील रंजक द्रव्य (cyanidine diglyc osides ) होते हैं. बीजों में कैल्शियम और प्रोटीन विशेष रूप से होता है. इसके अलावा टेनिन १९ %, elegic एसिड , गैलिक एसिड (१-२ % ) , एक ग्लाइकोसाइड , स्टार्च तथा हलके पीले रंग का सुगन्धित तेल ०.०५ % होता है. इसके काण्ड की छाल में नेटुलिनीक एसिड, बी- सीटोस्टेरॉल , फ्राइडलिन, टेनिन (१०-१२ % ), गैलिक एसिड, इलैजिक एसिड और मिरिसेटिन होते हैं.

जामुन का परिचय (introduction of jamun ) - जामुन लवंग कुल (मिरतेसी myrtaceae ) का वृक्ष है जो आम के वृक्ष के बराबर ऊँचा और विशाल होता है. इसके पत्ते भी आम के पत्तों से मिलते-जुलते होते हैं. यूँ तो जामुन की कई जातियां होती हैं पर राज जम्बू, शूद्र जम्बू और भूमि जम्बू - ये तीन जातियां प्रमुख हैं. जामुन को "फलेन" या फलेंद्र भी कहते हैं. क्षुद्र जम्बू को छोटी जामुन या कठजामुन भी कहते हैं. इसमें गूदा कम होता है. बड़ी जामुन को राज जामुन कहते हैं और यही जाती श्रेष्ठ होती है. इसके वृक्ष में अप्रैल से जून मास तक फूल और जून-जुलाई मास में फल आ जाते हैं इसलिए जामुन को वर्षा ऋतू का फल कहा जाता है.

जामुन के उपयोग (uses of jamun ) - जामुन का फल चूँकि स्वाद में कसैला, रूखा और तूरा होता है तथा इसे खाते ही जीभ में ऐंठन व् रुक्षता पैदा हो जाती है इसलिए इसे खाना कम पसंद किया जाता है. नमक के साथ खाने से इसका स्वाद थोड़ा अच्छा हो जाता है. जामुन रूखी व् कसैली (कषाय रसयुक्त ) होने से कफ का और शीतल तथा कषाय होने से पित्त का शमन करती है लेकिन आयुर्वेद के चरक संहिता के अनुसार रूखी, कषाय युक्त व् शीतल होने से प्रबल वातवर्धक भी होती है इसलिए इसे कम मात्रा में ही खाना चाहिए. यह स्तम्भन करने, त्वचा रोग नष्ट करने और जलन को शांत करने में उपयोगी होती है. सुश्रुत संहिता के अनुसार भी जामुन वातकारक, ग्राही और कफ व् पित्त का शमन करने वाली होती है. जामुन अग्नि प्रदीप्त करने वाली, पाचन शक्ति बढ़ने वाली, लिवर को सक्रीय करने वाली होती है और इसकी गुठली की गिरी का चूर्ण मधुमेह और बहुमूत्र रोग की चिकित्सा में उपयोगी सिद्ध होता है.

कुछ रोगों में जामुन के घरेलु इलाज के रूप में में उपयोगी प्रयोग प्रस्तुत लिए जा रहे हैं ( Now we will list uses of jaamun as an ayurveda home remedy for the treatment of some diseases ) :-

(१) जामुन का मधुमेह में प्रयोग (use of jamun for the treatment of madhumeh , Diabetes ) - जामुन की गुठली की गिरी का बारीक़ पिसा हुआ चूर्ण, आधी चम्मच, सुबह शाम, पानी के साथ फांक कर सेवन करने से मधुमेह रोग में लाभ होता है. जब मूत्र में शर्करा आना बंद हो जाए तब इसका सेवन बंद कर देना चाहिए.

(२) आंवयुक्त दस्त में जामुन का प्रयोग (use of jamun for the treatment of loose motion ) - जामुन और आम की गुठलियों की गिरी का महीन पिसा हुआ चूर्ण, समान वज़न में लेकर मिला लें. इस मिश्रण को, सुबह शाम, आधा आधा चम्मच, पानी के साथ, लेने से आंवयुक्त दस्त होना बंद हो जाता है.

(३) उलटी-दस्त के इलाज में जामुन का प्रयोग (use of jamun in the treatment of vomiting -loose motion ) - जामुन का गूदा पानी में घोलकर शरबत बनाकर पीने से उलटी-दस्त, जी मचलाना, खुनी दस्त और खुनी बवासीर में लाभ होता है.

(४) उदर रोग में जामुन का प्रयोग (uses of jamun for the treatment of stomach problems /diseases ) - भोजन के बाद एक चम्मच जामुन का सिरका, थोड़े से पानी में घोलकर पीने से उदर व्याधियां दूर होती हैं, उदर शूल नष्ट होता है तथा तिल्ली व् यकृत को लाभ होता है. जामुन का सिरका पंसारी या अचार-मुरब्बा बेचने वाली दूकान पर मिलता है.

(५) मसूड़े के लिए जामुन का उपयोग (jamun uses for gums ) - जामुन के पत्तों को जलाकर राख कर लें और महीन पीस लें. सुबह शाम इस राख को मसूड़ों पर लगाकर मंजन करने से मसूड़े स्वस्थ व् निरोगी तथा दांत मज़बूत होते हैं.

(६) छाले में जामुन का प्रयोग (use of jamun in treatment of ulcer /sore ) - जामुन के नरम ताज़े पत्ते तोड़ कर पानी के साथ पीस कर, इसका रस पानी सहित कपडे से छान लें. इस पानी से सुबह शाम कुल्ले और गरारे लाभ न होने तक करें. मुंह के छाले ठीक हो जायेंगे .

(७) खुनी बवासीर में जामुन का प्रयोग (use of jamun for treatment of bloody piles ) - जामुन के ताज़े नरम पत्तों को गाय के पाव भर दूध में घोंट पीस कर छान लें और प्रतिदिन सुबह खाली पेट पियें. इस प्रयोग से खुनी बवासीर ठीक होती है.

जामुन के औषधीय उपयोग (remedial and medicinal use of jamun)

दंतरोग - जामुन के पत्तों की राख दांत और मसूड़ों पर मलने से दांत और मसूड़े मज़बूत होते है. जामुन के पके हुए फलों के रस को मुंह में भरकर अच्छी तरह हिला कर कुल्ला करने से पायरिया रोग में बहुत लाभ होता है.

मधुमेह (डायबिटीज ) - जामुन की गुठली की गिरी का बारीक़ पिसा हुआ चूर्ण , आधी छोटी चम्मच, सुबह-शाम, पानी के साथ फांकने से मधुमेह रोग में लाभ होता है.

ख़ूनी बवासीर - इसके ताज़े १० ग्राम नरम पत्ते गाय के पाव भर दूध में घोंट पीस कर छान लें और प्रतिदिन सुबह खाली पेट पियें. इस प्रयोग से ख़ूनी बवासीर में लाभ होता है.

पथरी - जामुन के १०-१५ कोमल पत्तों का कल्क (लुगदी) बना कर, इस पर काली मिर्च २-३ नग का चूर्ण बुरक कर सुबह-शाम सेवन करने से पथरी टुकड़े टुकड़े होकर मूत्र द्वारा बाहर निकल जाती है. अश्मरी का यह एक उत्तम उपचार है.

उदर रोग - भोजन के बाद एक चम्मच जामुन का सिरका थोड़े से पानी में घोल कर पिने से उदर व्याधियां दूर होती हैं. उदरशूल नष्ट होता है तथा तिल्ली व् यकृत में लाभ होता है. जामुन का सिरका पंसारी या अचार-मुरब्बा बेचने वाली दुकानों में मिलता है.

 

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