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Ayurveda and Digestive Health, Abdominal Diseases and Stomach Problems


Ajirna , Dyspepsia

“Abdominal disease” is a very comprehensive word. There are several important body parts in the Abdomen. These parts are Stomach, small and large intestine, appendix, kidneys, pancreas and Spleen etc. if there is some swelling in any of these parts then Abdomen becomes painfully large and it comes little outside. This condition is called abdominal disease.in common language this condition is called “abdominal enlargement”. This disease causes stomach pain, inflammation, stomach heaviness etc.

Narayan Churna

Narayan Churna ingredients: Ajwain, Howber, dhaniya, harad, baheda, aamla, kalaonji, soyabeen, kala jeera, peeplamool, ajmod, kachoor, vach, safed jeera, saunth, kaali mirch, satyanaasi ki jad, peepal, chitrakmool, jawaakhar, sajjikshar, pushkarmool, kooth, sendha namak, kaala namak, saambhar namak, samudra namak, bid namak and vaay vidang – all 10-10 grams each. Nishoth and indrayan ki jad – 20-20 grams. Dantimool – 30 grams. Thuar kaand – 40 grams.

Narayan Churna preparation method: mix and grind all these ingredients together and prepare a powder. your “Narayan Churna” is ready.

Narayan Churna dosage: dosage of Narayan Churna varies depending on the ailment. It is generally taken 2 grams in the morning time.in Abdominal disease it is taken with chhaachh(mattha). In acidity it is taken with curd.in piles it is taken with Pomagranate juice.it should be taken with hot water for non-digestion related problems.

Narayan Churna: benefits: Narayan Churna is mainly used for the cure and treatments of abdominal diseases and stomach related problems.

Gas trouble

Due to inappropriate and irregular lifestyle and eating habits gas trouble has become a very common problem these days. Indigestion and constipation causes vata prakop and result in gas trouble. Gas trouble causes increase in gas within the stomach, abdomen swelling and joint pain.

अजीर्ण ( Ajirna , Dyspepsia और Indigestion )
अजीर्ण ( Ajirna , Dyspepsia और Indigestion )

biovatica .com के विभिन्न अलग अलग आर्टिकल्स में हम अम्लपित्त,कब्ज़, गैस-व्याधि, पेप्टिक अलसर और अतिसार आदि रोगों के बारे में बहुत ही उपयोगी एयर ज्ञानवर्धक विवरण प्रस्तुत कर चुके हैं. अब इस आर्टिकल में यहाँ अजीर्ण रोग उत्पन्न होने के कारणों और इसकी चिकित्सा के बारे में उपयोगी और गुणकारी जानकारी प्रस्तुत की जा रही है.

अजीर्ण को मेडिकल भाषा में डिस्पेप्सिया (dyspepsia ) कहते हैं. खाया हुआ आहार पूरी तरह न पचे, इसे अपच या अजीर्ण कहते हैं. इस स्थिति का निर्माण होता है गलत ढंग से आहार-विहार करने से, और यह स्थिति कई रोगों को जन्म देती है. आमाशय और आँतों की क्रिया बिगड़ने से आहार ठीक से पचता नहीं और अजीर्ण हो जाता है. इसे मेडिकल भाषा में, लक्षणों के अनुसार, एक्यूट गैस्ट्राइटिस (acute gastritis ) या इनडाइजेशन (indigestion ) भी कहते हैं.

अजीर्ण के कारण (causes of ajirn , dyspepsia or indigestion ) - गरिष्ठ यानि भारी देर से पचने वाले चिकनाईयुक्त स्निग्ध , बासे, तले हुए, तेज़ मिर्चमसालेदार पदार्थों का अति मात्रा में और लगातार सेवन करना , खाया हुआ भोजन पचने से पहले फिर से भोजन या कोई भारी खाद्य पदार्थ खा लेना, मादक द्रव्यों का सेवन करना आदि कारणों से पाचन क्रिया बिगड़ती है. खानपान और दिनचर्या में अनियमितता अपच का प्रमुख कारण होता है और अपच होना ही अजीर्ण होना होता है. आयुर्वेद ने लक्षणों के अनुसार अजीर्ण पांच प्रकार का बताया है यथा (१) सामान्य अजीर्ण (२)आमाजीर्ण (३) विदग्धाजीर्ण (४) विश्दग्धाजीर्ण और (५ ) रसशेषाअजीर्ण. अब इनका संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत है: -

सामान्य अजीर्ण - भोजन की मात्रा अधिक होने से अपच होने को सामान्य अजीर्ण कहते हैं. स्वाद के लोभ में ज़्यादा खा लेना इसका प्रमुख कारण है. शरीर में भारीपन, बार बार पेशाब होना व् सिरदर्द होना इसके प्रमुख लक्षण हैं.
आमाजीर्ण - आमाजीर्ण में कफ की प्रधानता रहती है. आँखों के आसपास सूजन , तबियत में भारीपन व् गिरावट, डकार में खाये हुए किसी पदार्थ की गंध होना आदि आमाजीर्ण के प्रमुख लक्षण हैं.
विदग्धाजीर्ण - पित्त प्रकोप से यह अजीर्ण होता है. प्यास, भ्र्म, खट्टी डकार, पेशाब पीले रंग का, पसीना आना, नींद न आना, बेचैनी व् जलन होना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.
विषदग्धजीर्ण - इसे वात प्रकोप से होने वाला अजीर्ण बताया गया है. हाथ पैर में दर्द व् टूटन, बेचैनी, अंगों में जकडन, पेट में भारीपन, भ्र्म आदि इस अजीर्ण के प्रमुख लक्षण हैं.
रस शेषाअजीर्ण - इस अजीर्ण में भोजन में अरुचि, ह्रदय में भारीपन व् दर्द होना, मुंह में लार ज्यादा आना, उदर में आहार रस शेष बच जाना, मरोड़ के साथ चिकना मल निकलना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.

अजीर्ण के आयुर्वेदिक घरेलु इलाज (Ayurveda home remedies for ajirn , dyspepsia or indigestion )

अजीर्ण नष्ट करने वाले घरेलु अनुभूत नुस्खे प्रस्तुत हैं - (१) पहला नुस्खा - त्रिकुट (सौंठ, पीपल, कालीमिर्च ) , यवक्षार और जीरा - तीनों बारीक़ पिसे हुए १०-१० ग्राम मिला कर फिर थोड़ा पीस कर एक जान कर लें. भोजन से पहले आधा चम्मच चूर्ण शहद में मिला कर चाट लिया करें.
(२) दूसरा नुस्खा - कला नमक, भुना जीरा, सौंठ, नौसादर तथा निम्बू का सत्व - २०-२० ग्राम और मिश्री १५० ग्राम लें. सबको खूब कूटपीस कर मिला लें. आधे से एक चम्मच चूर्ण दिन में तीन बार पानी के साथ लेने से अजीर्ण दूर होता है.
(३) तीसरा नुस्खा - सौंठ, काली मिर्च, पीपल, अजमोद, सेंधानमक, जीरा, कालाजीरा, और भुनी हुई हींग सब २५-२५ ग्राम बारीक़ पीस कर मिला लें. आधा से एक चम्मच सुबह शाम थोड़े से शुद्ध घी में मिला कर सेवन करें. घी न हो तो पानी के साथ ले लें. यह अजीर्ण की श्रेष्ठ दवा है. यह नुस्खा 'हिंग्वाष्टक चूर्ण ' (hingwashtak churn ) के नाम से बना बनाया बाजार में मिलता है.
(४) अग्निकुमार रस, संजीवनी वटी और लहसुनादि वटी - तीनों १-१ गोली सुबह शाम पानी के साथ लें. भोजन के बाद गैसोल वटी २-२ गोली दोनों वक्त पानी के साथ लें. भोजन के साथ या अंत में पानी न पियें और प्रत्येक कौर को ३२ बार चबा कर निगलें. औषधि सेवन करने के साथ उन कारणों को पहले दूर करें जिनसे अजीर्ण होता है.

अतिसोल वटी (Atisol Vati )

उदर रोग आमातिसार नाशक अतिसोल वटी

आँव युक्त जीर्ण प्रवाहिका (क्रोनिक अमीबिक डिसेन्ट्री ) बार-बार होने वाली और आजीवन कष्ट देने वाली बीमारी बन जाती है. अगर आवश्यक परहेज का सख्ती से पालन और उचित औषधियों का सेवन न किया जाए तो इस रोग के रोगी द्वारा की गई बदपरहेजी और इलाज में की गई लापरवाही बहुत महँगी तो पड़ती ही है साथ ही जीवन भर रोगी को कष्ट भी देती है. इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में ही इसे जड़ से उखाड़ कर फेंक देना चाहिए. इस हेतु एक उत्तम गुणकारी आयुर्वेदिक योग अतिसोल वटी का परिचय प्रस्तुत है.

अतिसोल वटी के घटक द्रव्य (ingredients of Atisol Vati) - पंचामृत पर्पटी , पीपल, शुद्ध सोनगेरु, हरड़ - १०-१० ग्राम, कृमि कुठार रस व् प्रवाल पंचामृत रस १५-१५ ग्राम. भावना द्रव्य - कुरज, दारुहरिद्रा, पंचकोल, नागकेशर, गिलोय ५-५ ग्राम. वातसकादि गहन क्वाथ १५ ग्राम, पुनर्नवा १० ग्राम.
अतिसोल वटी निर्माण विधि (preparation method of Atisol Vati ) - भावना द्रव्यों को अलग रख कर, शेष द्रव्यों को खूब कूट पीस कर बारीक महीन चूर्ण करके खरल में डाल दें. अब भावना द्रव्यों को मोटा मोटा जौकुट कर काढ़ा करें. जब पानी एक चौथाई बचे तब उतार कर छान लें और खरल में डाल कर घुटाई करें. जब सब द्रव्य मिल कर एक जान हो जाएँ तब मटर बराबर गोलियां बना कर छाया में सूखा लें.
अतिसोल वटी मात्रा और सेवन विधि (Atisol Vati quantity and dosage ) - २-२ गोली दिन में तीन बार छाछ या पानी के साथ लें.
अतिसोल वती के लाभ (Advantages and health benefits of ATISOL VATI ) - यह नुस्खा प्रवाहिका (dysentery ) ठीक करने के अलावा एमीबाइसिस (Amebiasis ) रोग को भी ठीक करने में सफल हुआ है. मरोड़ के साथ दस्त होना, आँव व् खून के साथ बार-बार दस्त होना आदि लक्षणों वाले अतिसार, आमातिसार और रक्तातिसार आदि रोगों में अतिसोल वटी बहुत लाभकारी योग है. यह आम को पचाकर मॉल को बांधता है, यकृत को बल देता है और दस्त के साथ रक्त आना रोकता है. यह नुस्खा इसी नाम से बना बनाया बाज़ार में मिलता है.

 

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