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Cancer Ayurveda, कैंसर और आयुर्वेद

कैंसर के प्रति जागरूकता ही इसके फैलाव को रोक सकती है

"विश्व कैंसर दिवस" के अवसर पर हर वर्ष की तरह ४ फ़रवरी को रिसर्च सेन्टर के वाराणसी स्थित प्रधान कार्यालय के साथ ही मुंबई, कोलकाता, बंगलुरु और गुवाहाटी स्थित शाखाओं पर भी तरह तरह के आयोजन किये गए. इस वर्ष विशेष रूप से कैंसर के प्रति जागरूक रहने के लिए लोगों को प्रेरित किया गया. इस अवसर पर आयोजित सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य यही था की लोगों को रहन-सहन , खान-पान और इलाज के समय बरती जाने वाली सावधानियों की जानकारी दी जाए ताकि कैंसर जैसी बीमारी से बचाव हो सके. लगभग सभी केंद्रों पर विश्व कैंसर दिवस के उपलक्ष्य में रैलियां निकली गयीं तथा अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किये गए. इन विभिन्न आयोजनों से सम्बंधित एक रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं डॉ. दीपक जैन .

इस अवसर पर आयोजित एक गोष्ठी में रिसर्च सेंटर के श्री त्रिवेदी ने बताया की सेंटर ने डॉ तिवारी एवं प्रोफ़ेसर त्रिवेदी द्वारा आविष्कृत पोषक ऊर्जा विज्ञान द्वारा हज़ारों कैंसर रोगियों को सामान्य जीवन में लौटाने में सफलता पायी है और यहाँ से कैंसर मुक्त होने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है परन्तु हम चाहते हैं की लोगों को उन बातों से भी अवगत कराया जाए जिससे वे कैंसर जैसी भयंकर बीमारी की चपेट में आने से बच सकें. किसी बीमारी के होने के बाद उसका इलाज उसका समाधान हो सकता है परन्तु उससे भी ज़रूरी है की हम अपने जीवन में कुछ बातों का पालन करके इस बीमारी को अपने पास फटकने ही न दें.

लगभग चार दशक पूर्व 'कैंसर' का नाम इतना व्यापक नहीं था जितना आज है. तब इसे एक रहस्य्मयी बीमारी माना जाता था और इसके शिकार भी इक्के-दुक्के होते थे. ज़रा याद कीजिये उस ज़माने में दो-चार गांवों कभी कभार सुनाई देता था की फलां को कैंसर हो गया है या शहरों में जो कैंसर रोगी होते थे उन्हें उँगलियों पर गिना जा सकता था; धीरे धीरे कैंसर शब्द सामान्य होता गया और आज तो यह आम हो गया है और गली-गली गाँव गाँव में कैंसर रोगियों की भरमार हो गयी है. आखिर पिछले वर्षों में ऐसी क्या बात हो गयी की कैंसर रोगियों की संख्या इतनी तेजी से बढ़ गयी है? आइये, कुछ बिंदुओं पर विचार करते हैं जिनके कारण रोग का तेजी से प्रसार होता गया.

1) कृषि के क्षेत्र में परिवर्तन - पहले किसान पारम्परिक तरीके अपनाते हुए जैविक खादों का प्रयोग करके फसलें उगाया करते थे. पैदावार तब उतनी नहीं होती थी जिससे किसान संतुष्ट हो सकें. फिर आया हरित क्रांति का दौर. गांवों में एक नाम तेजी से फैला, यूरिया. यूरिया ने पैदावार में इतना उछाल पैदा कर दिया की हर किसान अपनी एक-एक इंच भूमि पर इसका प्रयोग करने लगा. यह वास्तविकता है की यूरिया ने फसलों की पैदावार को कई गुना बढ़ा दिया. दूसरी चीज जो किसानो ने अपनाई वह थी कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग. फसलों को नुक्सान पहुंचाने वाले कीटों से मुक्ति मिलने लगी. यूरिया और कीटनाशकों के प्रयोग से किसी को दूरगामी परिणाम की ना तो चिंता थी और ना ही किसी को ये अनुमान था की भविष्य में क्या होने वाला है. आखिर में वैज्ञानिकों ने यह घोषणा की की अत्यधिक उर्वरकों और कीटनाशकों ने तरह तरह की बिमारियों को फैलाने में अत्यधिक भूमिका निभाई है. १९७० के दशक में कॉर्नेल विश्व विद्यालय के डेविड पिमेंटों ने अपने शोध पत्र में कह दिया था की किसान जो कीटनाशक प्रयोग करते हैं उनमे से ९९.९ प्रतिशत कीटनाशक वातावरण में समा जाते हैं और केवल ०.०१ प्रतिशत ही अपने लक्ष्य तक पहुँचते हैं. इस शोध परिणाम को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया.मामला यहाँ तक पहुँच गया की उर्वरकों ने खेती योग्य भूमि की उर्वरा शक्ति को ही लगभग समाप्त कर दिया और कीटनाशकों ने लोगों के स्वास्थ्य पर तरह तरह के दुष्प्रभाव डाले. अब तो बात यहाँ तक पहुँच गयी है की खेती करनी है तो इनका प्रयोग करना ही पड़ेगा वर्ना फसल होगी ही नहीं. दूसरी और कीटनाशकों के रूप में फसलों पर छिड़के गए रसायन हमारे शरीर में पहुँचने लगे और तरह तरह की बिमारियों से लोग ग्रसित होने लगे. कैंसर का तेजी से फैलाव इन कारणों से भी हुआ. हहालाँकि कुछ किसानो ने बिना रसायनों का प्रयोग किये खेती करके एक उम्मीद की किरण जगाई है की सब कुछ ख़त्म नहीं हुआ है, बस लोगों को जागरूक करने की जरुरत है.

2) खान-पान में बदलाव - पहले के समय में सब्जियां खेतों से सीधे रसोईघर पहुँचती थी और भोजन उतना ही बनाया जाता था जितना खाया जा सके. समय की कमी और आधुनिकता ने पहले रेफ्रिजरेटर की खोज की जिसमे सब्जियों को कई दिनों तक रखा जा सकता है. इतना ही नहीं, अगर कोई भोजन सामग्री बच गयी तो उसे फ्रिज में रख कर कई दिनों तक प्रयोग में लाया जाने लगा. लोगों को लगता था की फ्रिज में रख देने से चीज ख़राब नहीं होती. यह गलत सोच थी. सब्ज़ियों को कुछ घंटो तक तो ताज़ा रखा जा सकता है परन्तु बचे हुए भोजन को दूसरे दिन नहीं खाया जाना चाहिए. बचे हुए भोजन को कुछ ही देर के लिए दूषित होने से बचाया जा सकता है, कई दिनों के लिए नहीं . रही सही कसर निकली, खाद्य पदार्थ बनाने वाली बड़ी कंपनियों ने . एक देश के डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ पूरी धरती की सैर करने लगे और लोगों के पेट में समाने लगे. इन खाद्य पदार्थों को लम्बे समय तक सुरक्षित रखने के लिए जिन रसायनों का प्रयोग किया जाता है वे लम्बे समय के बाद मनुष्य के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं. परीक्षणों से ये सिद्ध हो चूका है की भोजन को ख़राब होने से बचाने के लिए प्रेसेर्वटिव्स के रूप में जो नाइट्रेट्स और नाईट्राईटस प्रयोग किये जाते हैं वे एक निश्चित अवधि के बाद नाइट्रस के रूप में परिवर्तित होकर पेट के कैंसर का कारण बन जाते हैं. जंक फ़ूड के तौर पर कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने रसायनयुक्त खाद्य पदार्थों का इतना प्रचार प्रसार किया है की पूरी युवा पीढ़ी जंक फ़ूड की दीवानी हो गयी . पीने के लिए पानी की जगह रसायनयुक्त पेय पदार्थ आज लोगों की आदत बन चुके हैं जबकि कई बार ये बात सिद्ध हो चुकी है की इन पेय पदार्थों में हानिकारक पदार्थों का प्रयोग किया जाता है. कैंसर के फैलने में इन रसायनों का बहुत योगदान है.

3 ) अंधाधुंध दवाओं का प्रयोग - एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति आज विश्व की सबसे अधिक प्रसारित और प्रभावित करने वाली पद्धति बन चुकी है. सरकारें, दवा कंपनियां, अस्पताल, चिकित्सक और बाज़ार मिलकर लोगों को बाध्य कर देते हैं. दवा कंपनियों के उत्पाद को खपाने के लिए सरकारों को प्रभावित किया जाता है और सरकारें अस्पताल और चिकित्सकों को निर्देशित करती हैं की वे बाजार में इन दवाओं को खपाने की व्यवस्था करते रहें. जिन दवाओं से जान बचाई जा सकती हैं और जो जरुरी होती हैं उनके प्रयोग तक तो गनीमत है पर अस्पताल और चिकित्सक लोगों को कई ऐसी दवाइयां लेने के लिए भी मजबूर करते हैं जिनकी जरुरत नहीं होती और जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं. भारत में कई ऐसी दवाइयों का सेवन धड़ल्ले से कराया जाता है जो दुनिया के कई देशों में प्रतिबंधित होती हैं. हाल ही में भारत के स्वास्थ और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक विज्ञापन जारी करके लोगों को एंटीबायोटिक दवाओं के सेवन से बचने के लिए कहा है. यह बड़ी हास्यास्पद बात है की सरकार विज्ञापन देकर यह तो मान रही है की एंटीबायोटिक दवाओं से लोगों को नुक्सान हो रहा है जबकि इन दवाओं को बाज़ार में आने से रोकने के लिए विज्ञापन नहीं बल्कि बड़े और कड़े कदम सरकार को उठाने चाहिए. एंटीबायोटिक्स का कितना दुष्प्रभाव हो रहा है यह एक उदाहरण से समझा जा सकता है. आज से तीन चार दशक पूर्व लिवर कैंसर , पैनक्रिआस का कैंसर, ब्लड कैंसर तथा पेट के कैंसर के रोगी बहुत कम थे. कहीं- कहीं इन कैंसर के रोगियों के होने की सूचना मिलती थी. वैसे तो आज कई प्रकार के कैंसर रोगियों की संख्या में तेजी आयी है परन्तु लिवर, पैंक्रियास, पेट और ब्लड कैंसर के रोगियों की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. एक लम्बे अध्ययन के बाद ये बात सामने आयी की एंटीबायोटिक्स का प्रयोग चिकित्सकों , अस्पतालों और रोगियों के लिए एक फैशन बन चूका है जिसके दुष्प्रभाव के रूप में अन्य बिमारियों के साथ कैंसर का फैलाव भी तेज़ी से होता जा रहा है. भारत में एक बात और आम हो गयी है, वह है बिना चिकित्सक की सलाह के दवाइयों का प्रयोग. लोग एक बार किसी बीमारी के लिए चिकित्सक को दिखते हैं और जो दवा चिकित्सक लिख देता है बाद में उसी तरह की बीमारी होने पर लोग स्वयं ही दूकान से वह दवाई लेकर मनमाना सेवन शुरू कर देते हैं. कई दवाओं के दुकानदार भी चिकित्सक का काम करते हैं. हद तो तब हो जाती है जब रोगी, जल्दी ठीक होने की गरज से, एंटीबायोटिक्स की खुराक बढ़ाकर लेने लगता है.

आखिर इन समस्याओं से बचने का तरीका क्या हो सकता है. बीमारी होने के बाद कुशल चिकित्सक या अस्पताल की मदद तो लेनी ही चाहिए पर कुछ बातों पर बहुत ही सावधानीपूर्वक अमल करने की ज़रूरत है. सावधानी समाज के हर तबके के लोगों को बरतनी पड़ेगी क्यूंकि हर आअदमी खेतों में उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग को नहीं रोक सकता , यह काम केवल किसान ही कर सकते हैं. हाँ खाने पीने के मामलों में हमें स्वयं ही सावधानी बरतनी पड़ेगी . प्रयास यह होना चाहिए की हम ताज़ा भोजन करें और जंक फ़ूड, फास्ट फ़ूड और डिब्बाबंद पेय पदार्थ और संगृहीत खाद्य पदार्थों आदि के सेवन से जहाँ तक हो सके बचें. बीमार होने पर केवल योग्य चिकित्सक से सलाह लें और कभी भी अपनी मर्ज़ी से किसी भी प्रकार की दवाई का सेवन ना करें.

 

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